Wednesday, April 2, 2025

संवाद

एक विस्मित सा संवाद था उसकी आयतों कारीगरी में l

केशों गुलाब लिखी जैसे कोई ग़ज़ल थी उसकी अदाकारी में ll


रूह महकी थी जिन अधूरे खत भींगी आँचल साझेदारी में l

नफासत नजाकत लाली शामिल जिसकी रुखसार तरफदारी में ll


काफिर महकी आँखें पेंचों उलझी जिसकी रहदारी में l

उत्कर्ष स्पर्श था उसकी चंदन बिंदी पहेली रंगदारी में ll


दार्शनिक सी उसकी गलियों की वो टेढ़ी मेढ़ी पगडण्डियाँ l

जुस्तजू गुलदस्ता कहानियां पिरोती कर्णफूल आसमानों की ll


इस खामोशी स्पन्दन से गुदगुदा करवटें बदलती आरजूएँ l

तस्वीर नयी सहर रंग गयी बैरंग खत पन्नों रुकी कूँची राहों में ll