ठिकाने को उनकी रजामंदी क्या मिली
पता अपना मैं भूल आया उनके पते पे
अब खत लिखुँ या भेजूँ संदेशा
मशवरा कैसे करूँ इन घरोंदों से
मौसम जो बदला आशियानें का
ख्याल ही ना रहा कब छूट गए पीछे
पते बचपन के संगी यारों के
मदहोश ऐसा किया उनकी शोख अदाओं ने
मानो गुज़ारिश कर रही हो
खत एक तो लिखूँ नए ठिकाने पे
अफ़सोस मगर
मेरी नई रह गुज़र की डगर पर
पता उनका भी अधूरा था मेरी मंज़िल की राहों पर
और ना जाने कब कशिश की इस कशमश में
अपना पता भी मैं भूल आया उनके पते पर
अपना पता भी मैं भूल आया उनके पते पर
पता अपना मैं भूल आया उनके पते पे
अब खत लिखुँ या भेजूँ संदेशा
मशवरा कैसे करूँ इन घरोंदों से
मौसम जो बदला आशियानें का
ख्याल ही ना रहा कब छूट गए पीछे
पते बचपन के संगी यारों के
मदहोश ऐसा किया उनकी शोख अदाओं ने
मानो गुज़ारिश कर रही हो
खत एक तो लिखूँ नए ठिकाने पे
अफ़सोस मगर
मेरी नई रह गुज़र की डगर पर
पता उनका भी अधूरा था मेरी मंज़िल की राहों पर
और ना जाने कब कशिश की इस कशमश में
अपना पता भी मैं भूल आया उनके पते पर
अपना पता भी मैं भूल आया उनके पते पर
आदरणीय शास्त्री जी
ReplyDeleteबहुत बहुत धन्यवाद
सादर
मनोज