RAAGDEVRAN
POEMS BY MANOJ KAYAL
Saturday, January 17, 2026
ll धैर्य ll
Sunday, January 4, 2026
महासमर
तहजीब बाजीयाँ मोगरा गुलाब
कांटों खुशबुदारी की
l
कायनात सहर भीगें
नयनों अक्स ओस पहरेदारी की ll
स्वरांजलि दीप ध्वनि
हिम पटल शिखर
लहर मझधारों की
l
गाथा चिंतन कहानी
नयी बादलों के
स्वरूप संसारों की
ll
अंतरंगी धागे प्रचंड
अलाव तपिश सुनहरी
धूपों की I
क्षितिज मेरुदंड गुँथ रही
इन्द्रधनुषी वैतरणी अनुरागों
की ll
लिपिबद्ध हो केशवों
झांझर मेहंदी पंखुड़ि
हाथों की l
कह रही नयी
चेतना काफिर आवारा
हवाओं की ll
ख्यालातों के खाली
ज़िल्द पर पानी स्याही अल्फाजों
की l
लिख गयी नाजुक
गठबंधन महासमर प्रयासों
की ll
Sunday, December 21, 2025
पंजरी
सर्द हवाएँ ख़यालों होले से झूमकौ फुसफुसा गयी एक मिठी सी राग l
नाजुक हवाएँ पूछ
रही पता उस अक्स तलब
जिसकी थी कभी पास ll
कानाफूसी रूमानियत थामी थी सोंधी सोंधी
पंजरी सी मुस्कान
l
परिचय पूछ रहा
अल्हड काजल कहा
छुपी थी आँचल मनुहार ll
सौम्य काव्यअग्नि रूप सृष्टि
माथे ललाट प्रतिबिंब
चंदन आकार l
गुँथे घूंघट पीछे
सहज संक्षेप लिख
गयी एक सांची
चंद्र आधार ll
उलझा बिखरी केश
लट्टे वेणी सी सज गयी
सुरमई साँझ कर्णताल
l
सलाह चंचल गुदगुदी
पायल सुना रही
कोई सुन्दर कहानी
संसार ll
कानाफूसी बीचों बीच
थम थम बरसी जोगन सी
मेघ सुर करताल
l
ओस बूँदों ढ़की
पलकें शागिर्द सी
नाच उठी नींद
सिरहानों साथ ll
Monday, December 15, 2025
अकेला क्यों
कुछ फटे बदरंगे अध लिखे पन्ने किताबों के संभाल रखने को दिल करता हैं l
इसकी कोई धुंधली तस्वीर जाने क्यों आज भी अक्सर अकेले में बातें करती हैं ll
हसरतें इसकी काले गुलाबों सी हवाओ को जब अपना दर्द बयां करती हैँ l
बिसरी मंजिलें सगर चंदन खुशबु यादें लपेटे पिंजर से आजाद हो आती हैं ll
धब्बे पानी के अंगुलियों जब सहलाती हैं चुभन अक्षरों को सिरहा जाती हैं l
लेखनी रिसता अश्रु सागर इसके पनघट छाया कतरा कतरा लहू बन आती हैं ll
शून्य इसके घाटों का पदचापों की पहचान रोशनी प्रतिबिंब बन दर्द दे जाती हैं l
मैं अकेला क्यों इस उलझन को इबादत की पहेली आदत और उलझा जाती हैं ll
हवाएँ साँसों की बातें इनसे जब करती हैं रूह थम सहम आती हैं l
परछाईं तलाश सुकून अहसासों की ग़म कुछ देर को भूला जाती हैं ll
Wednesday, December 10, 2025
ll अंतिम अरदास ll
स्पर्श सफर रूह ठहरा था जिस जिस्म अंगीकार को l
भस्मीभूत हो गया पंचतत्व कह अलविदा संसार को ll
वात्सल्य छवि अर्पण निखरी थी जिस मातृत्व छाँव को l
ढ़ल चिता राख तर्पण मिल गयी गंगा चरणों धाम को ll
मोह काया दर्पण भूल गया उस परिचित सजी बारात को l
संग कफन जनाजे जब वो निकली सज सबे बारात को ll
अवध दीपावली तोरण सजी थी जिस शामें बहार को l
छोड़ किलकारी आँचल बिसरा गयी बचपन साँझ को ll
अतिरिक्त साँसे पास थी नहीं अंतिम सफर अरदास को l
वरदान अभिषप्त आँसू शान्त खो गये रूठे श्मशान को ll