लाजमी थी गलतफहमियां मधुशाला क़ुरबत आलिंगन हाथ में l
मदहोश थी दहलीजें इसकी नजदीकियां अफ़साने आँगन खास में ll
रंग ज़माने खुदगर्जीयों के थे बहरूपिये मयखाने सरूर रफ्तार में l
नाजुक थी कड़ियां इसके मजहब तालीम छलकते जामों प्याम में ll
पूरी थी जिन्दगानी इसकी रूह कडियों महफ़िलों सजती शाम में l
शून्य भी शृंगार सा था इसके कायनात पटल चमकते अर्ध चाँद में ll
इन्द्रधनुषी पगडण्डियाँ सी रोशनी मधुशाला छलकते नयनों खोये जाम में l
तर गयी कंठ वैतरणी भूल काफिर पीड़ा सुरा के अस्तित्व खोई दालान में ll
मीमांसा फिर पहरेदारी थी मदिरा की अनकही प्रतिक्रिया समीक्षा राज में l
जीना फिर से सीखा गयी इसकी तवायफ कोठी अपने आँचल अंदाज़ में ll